नयी दिल्ली 27 दिसंबर (वार्ता) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने केले की जानलेवा बीमारी पनामा विल्ट की रोकथाम के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए ड्रोन की मदद लेना शुरू कर दिया है । ड्रोन की मदद से गावों के केले के बाग की जो तस्वीर ली जाती है उससे बीमारी की पहचान में आसानी होती है । इसके साथ ही रोग प्रबन्ध की रणनीति बनाने तथा चित्र से विश्लेषण में आसानी होती है । इसमें जो सॉफ्टवेयर लगे है उससे रोग प्रभावित क्षेत्र के पहचान में भी आसानी होती है जिससे बीमारी का उपचार तेजी से किया जाता है । उत्तर प्रदेश में किसान वैज्ञानिक ढंग से केले के बाग लगाने में तेजी से अभिरुचि ले रहे हैजिसे निकट भविष्य में उसके प्रमुख केला उत्पादक राज्य बनने की संभावना है । दुर्भाग्यवश बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में केले की फसल में पनामा विल्ट का प्रकोप हो गया है । इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसानों की आजीविका केले की फसल पर निर्भर है । अन्य फसलों की तुलना में केले के बाग से किसानों को अच्छी आय मिलती है । नयी तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिकों ने महामारी की तरह फैले इस बीमारी की पहचान कर ली है ,जिसका पता आसानी से न तो किसानों को लगता है और न ही वैज्ञानिको को । पनामा विल्ट बीमारी की पहचान में कई कारणों से भरी परेशानी होती है । रोगग्रस्त क्षेत्र की पहचान होने पर इसका उपचार करने में आसानी होती है तथा पहचान में देर होने पर यह बीमारी बहुत तेजी से फैलता है जिससे किसानों को भारी आर्थिक हानि होती है । एक अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश में करीब 90 हजार हेक्टेयर में केले के बाग हैं जिसके कारण बीमारी की पहचान में समस्या होती है । इसके साथ ही बहुत कम वैज्ञानिक हैं जिन्हें इस बीमारी की पहचान कर उसका उपचार करने के लिए उन्हें प्रक्षितित किया गया है । भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को बराबर इस बीमारी के फैलने की सूचना मिलते रहती है। इस बीमारी के उपचार के लिए आईसीएआर फ्यूजिकंट पद्धति विकसित की गई है , जिसके लिए जरूरी है कि इसकी पहचान की जाए ताकि सही उपचार किया जा सके । इस बीमारी का संक्रमण तेजी से फैलता है । यह कृषि उपकरणों ,जूतों, साईकिल के टायर ,ट्रेक्टर आदि से भी फैलता है । सिंचाई के लिए उपयोग किए जाने वाले जल तथा बाढ़ के पानी से भी यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है । पनामा विल्ट बीमारी रोग प्रबन्धन पर लंबे समय से अनुसंधान कर रहे दामोदरन के अनुसार करीब छह हजार हेक्टेयर क्षेत्र में इस बीमारी का गंभीर खतरा है । इसका अध्ययन कर रोग प्रबन्ध किए जाने की जरूरत है ।ड्रोन की मदद के बिना मानवीय तौर पर यह काम एक साल में भी नहीं किया जा सकता है । मानवीय तौर पर प्रतिदिन भी उपचार का काम किया जाए तो इसमें पांच छह साल का समय लग जायेगा । तब तक यह बीमारी बिकराल रूप ले लेगी और केले के बाग बर्बाद हो जायेंगे । पनामा विल्ट समस्या के समाधान के लिए सामुदायिक स्तर पर प्रयास किए जाने की जरूरत है। अधिकांश इलाकों में यह है बीमारी एक खेत से दूसरे खेत में फ़ैल रही है । ड्रोन के माध्यम से इस बीमारी का आकलन आसानी से किया जाता है और से रोग प्रबन्धन में आसानी होती है । ड्रोन के माध्यम से बीमारी का जल्दी पता चलता है जिससे इसका उपचार तुरंत शुरू कर दिया जाता है जिससे नुकसान काम होता है । उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों को पनामा विल्ट बीमारी से करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है । केले की बागवानी के लिए अधिक पूंजी कि जरूरत होती है और नुकसान होने पर किसानों को आर्थिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित होती है।



