लखनऊ, 02 दिसम्बर (बु.)। एक दूसरे से मिलने और मेलजोल बढ़ाने के लिए सनातन काल से मेले लगने की परंपरा चली आर रही है। राजधानी में भी मुगलकालीन सुंदर द्वतीया पर हटिया मेला लगता है। अपनी तरह की इकलौता मेला है, जहां महिलाएं मेले में दर्पण खरीदती हैं और उसमे अपने श्रृंगार को निहाकर उसे दान करती हैं। सैकड़ों साल पुरानी इस परंपरा पर भी कोरोना का ग्रहण लग गया है। कानपुर रोड के बनी स्थित सई नदी के पुल के पास लगने वाला ऐतिहासिक मेला नहीं लगेेेेगा। देव दीपावली के दूसरे दिन अगहन मास की द्वतीया को मेला लगता है। इतिहासकार पद्मश्री डॉ.योगेश प्रवीन ने बताया कि मुगलकालीन मेले में महिलाएं अपनी सुंदरता को निहारती थीं और फिर उस दर्पण का दान करती थीं। बनी के पास करीब 400 साल से लग रहे मेले के दौरान सई नदी में स्नान कर भोलेनाथ के मंदिर पर दर्शन करके महिलांए दर्पण खरीदती थीं। अपनी हैसियत के अनुरूप दर्पण खरीदकर मंदिर के पास ही दान कर देती थीं।

दरअसल यहाँ कानपुर से राजधानी आने वाले वाहन व बैलगाड़ियां बनी स्थित सई नदी के पुल के पास रुकती थीं। धीरे-धीरे इस हाल्ट कहा जाने लगा और सुंदर द्वितीया के दिन यहां बाहर से लोग आकर रुकने लगे। धीरे-धीरे हटिया मेला हो गया। बनी निवासी शिव शंकर सिंह ने बताया कि पुल के पास ही शिव मंदिर है। सिद्धपीठ के रूप में स्थापित मंदिर भी सैकड़ों साल पुराना है। मेले में दादा दी के साथ आता था और वह भी मेले के बारे में बताते थे। मेले में राजधानी ही नहीं कई जिलों से दुकानदार आते थे। फिरोजाबादी चूड़ियां और श्रृंगार की दुकानों की अलग लेन होती थी जिसमे पुरुषों का जाना मना था। इस बार मेला नहीं लगेगा,लेकिन लोग शिव जी के दर्शन कर परंपरा का निवर्हन करेंगे। बंथरा निवासी विनय दीक्षित ने बताया कि खुर्जा की क्राकारी और सहारनपुर का लकड़ी का सामान मेले में मिलता था। धीरे-धीरे विस्तार हो गया। अपनी तरह का पहला मेला है जहां दर्पण दान किया जाता है।मान्यता है कि सुंदरता को निहारकर दर्पण दान करने से सुंदरता तो बनी ही रहती है, वहीं बाधाएं भी दूर हो जाती हैं। इसे एक तरह का टोटका भी माना जाता था। लक्ष्मणनगरी में ही यह परंपरा नजर आती है।



