दिल्ली, 13 दिसंबर,(बु.)। प्रगतिशील किसानों की नजर में कृषि कानूनों के खिलाफ किया जा रहा आंदोलन पूर्णतया बेबुनियाद है। आंदोलनकारी किसानों को चाहिए कि वे राजमार्ग खाली कर खेती-बाड़ी करें। उनका कहना है कि केंद्र सरकार नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों की हर समस्या का समाधान कर रही है। ऐसे में अडि़यल रवैया अपनाने से गतिरोध ही बढ़ेगा, इससे लाभ कुछ नहीं होने वाला। किसानों को वार्ता जारी रख आगे बढ़ना चाहिए। कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में बीज उत्पन्न करने वाले प्रगतिशील किसान अनंतराम दो टूक कहते हैं कि खेती-बाड़ी छोड़कर सड़कों पर डेरा डालने वाले किसान सही मायनों में किसान ही नहीं हैं। एक सच्चा किसान खेतीबाड़ी से मुंह मोड़कर धरना-प्रदर्शन नहीं करता। इसलिए किसानों के इस आंदोलन को जायज करार दिया नहीं जा सकता। बुलंदशहर (यूपी) के प्रगतिशील किसान कुलवंत सिंह गेंहू, गन्ना, हल्दी और सरसों की खेती करते हैं। उनकी राय भी कमोबेश ऐसी ही है। वह कहते हैं, पुराने कृषि कानूनों ने कभी किसानों को आगे नहीं बढ़ने दिया। आढ़ती और बिचौलिये तो मुनाफा कमाते रहे, जबकि किसान जिंदगी भर कर्ज लेकर काटता रहा। नए कृषि कानून नए अवसर लेकर आए हैं। हमें उनका स्वागत करना चाहिए। रेवाड़ी (हरियाणा) के किसान थावर सिंह गेंहू सहित फल सब्जियों की खेती करते हैं। वह कहते हैं, पिछले कुछ सालों में न जाने कितने ही किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए। एक समय तो ऐसा आ गया था कि किसानों की मौत ही अखबारों की सबसे बड़ी सुर्खियां होती थी। जाहिर सी बात है कि पुराने कृषि कानूनों की खामियां ही इसके लिए जिम्मेदार थीं।



