कानपुर, 05 दिसम्बर (बु.)। हमारे देश में पहले से प्राचीन सभ्यताओं को मान्यता दी जाती है। भारत का हर गांव, जनपद या प्रदेश अपनी किसी ना किसी बात के प्रसिद्ध है। भारत के हर कोने का अपना एक इतिहास है। फिलहाल हम बात कर रहे है उत्तर प्रदेश के कानपुर की। सुबह की सैर या फिर कानपुर के एतिहासक स्थलों को देखने वाले रोजाना नानाराव पार्क जाते हैं और वहां पर संरक्षित मेमोरियल वेल देखकर लौट जाते हैं। लेकिन, शायद इस मेमोरियल वेल को देखने वालों को उसका इतिहास स्याह इतिहास न पता हो। जब शहर में मेट्रो प्रबंधन ने खोदाई के लिए पुरातत्व विभाग से अनुमति मांगी तब एक बार फिर मेमोरियल वेल की यादें ताजा हो गई हैं। इस मेमोरियल वेल का इतिहास 1857 के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में छह दिसंबर से जुड़ा है, उस समय यह दिन कानपुर के लोगों के लिए अच्छा नहीं था। सुबह की सैर या फिर कानपुर के एतिहासक स्थलों को देखने वाले रोजाना नानाराव पार्क जाते हैं और वहां पर संरक्षित मेमोरियल वेल देखकर लौट जाते हैं। लेकिन, शायद इस मेमोरियल वेल को देखने वालों को उसका इतिहास स्याह इतिहास न पता हो। जब शहर में मेट्रो प्रबंधन ने खोदाई के लिए पुरातत्व विभाग से अनुमति मांगी तब एक बार फिर मेमोरियल वेल की यादें ताजा हो गई हैं। इस मेमोरियल वेल का इतिहास 1857 के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में छह दिसंबर से जुड़ा है, उस समय यह दिन कानपुर के लोगों के लिए अच्छा नहीं था। 15 जुलाई 1857 को जनरल हैवलाक इलाहाबाद से सेना लेकर चला तो बीबीघर में रखे गए अंग्रेजों को मार देने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय किसका था, इसको लेकर कई नाम चर्चित हैं लेकिन उसी शाम को बीबीघर में बंद सभी अंग्रेजों को मार दिया गया। अगले दिन सुबह उन सभी की लाशें वहीं लान में बने कुएं में डाल दी गईं। 16 जुलाई की शाम को महाराजपुर के पास जनरल हैवलाक और तात्या टोपे के नेतृत्व में देशी सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। 17 जुलाई को कानपुर अंग्रेजों के कब्जे में दोबारा आ गया। 20 जुलाई को ब्रिगेडियर नील कानपुर आया और 25 जुलाई को हैवलाॅक कानपुर की कमान उसे सौंप कर चला गया।तात्या टोपे ग्वालियर से कुछ फौज लेकर फिर कानपुर पहुंचे। 27 नवंबर की सुबह अंग्रेजों को हरा कर उन्होंने फिर कानपुर पर कब्जा कर लिया। ब्रिटिश फौज फिर किले के भीतर कैद हो गई। इसके बाद छह दिसंबर 1857 को कमांडर इन चीफ कोलिन कैंपबेल की तात्या टोपी की फौज से मुठभेड़ हुई। 15 हजार सिपाही होने के बाद भी तत्या टोपे की सेना पराजित हो गई। नाना साहब और तात्या टोपे बिठूर चले गए और अंग्रेजों के हाथ में कानपुर एक बार फिर आ गया।अंग्रेज अफसर ने बीबीघर के नरसंहार और नाना साहब का शासन मानने के लिए पूरे शहर पर सामूहिक जुर्माना लगाया। जुर्माना की जबरन वसूली करने के बाद धनराशि से बीबीघर के कुएं पर मेमोरियल वेल बनवा दिया था। इसमें डेढ़ सौ से अधिक अंग्रेजों में महिलाओं और बच्चाें को मार कर डाला दिया गया था। यहां पत्थर के नक्काशीदार पर्दे लगे और एंजिल की प्रतिमा भी लगी थी लेकिन अब कुछ नहीं है। आजादी के बाद तात्या टोपे की प्रतिमा लगाई गई थी, जो आज नदारद है। कुछ दिन पहले यह फिर चर्चा में आया जब मेट्रो को मेमोरियल वेल संरक्षित स्थल होने की वजह से खोदाई से पहले पुरातत्व विभाग से अनुमति लेनी पड़ी।



