लखनऊ, 8 जनवरी (बु.)। आधुनिकता के इस डिजिटल युग में भी पतंगबाजी का शौक सिर चढ़कर बोल रहा है। वहीं, चाइनीज मांझे का कलंक अब इस शौक को कटघरे में भी खड़ा कर रहा है। इस मांझे से राहगीर घायल हो रहे हैं तो एक साल में 1500 से दो हजार पक्षियों की जान भी जा रही है। लखनऊ विवि के इंस्टीट्यूट ऑफ वाइल्ड साइंस की प्रो.अमिता कनौजिया ने बताया कि मकर संक्रांति के दिन पतंग से घायल पक्षियों को बचाने और उनकी दिनचर्या में पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव पर मंथन होगा। मकर संक्रांति पर पक्षियों के रेस्क्यू अभियान के साथ ही पतंग न उड़ाने की अपील की जाएगी। रही सही कसर प्रदूषण की वजह पर्यावरण में आए बदलाव ने पूरी कर दी। आलम यह है कि कुकरैल व चिड़ियाघर के पास आने वाले साइबेरियन पक्षियों ने मुंह मोड़ लिया है। वाहनों के शोर की वजह से पक्षी अब नहीं आ रहे हैं। नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान के चिकित्सक डॉ.अशोक कश्यप ने बताया कि भी मौसम में आए बदलाव का असर यह रहा कि चिड़ियाघर के पास पक्षी नहीं आ रहे हैं।



