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Friday, March 6, 2026

एक साल में सरसों के तेल ने पकड़ी रफ्तार, लगातार बढ़ रही सरसों के तेल की कीमतें

मुजफ्फरनगर, 13 अक्तूबर (बु)। सरसों के तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है। दीपावली पर तेल के दामों में आई बढ़ोतरी आम जनता को परेशान कर सकती है। ऐसे में सवाल यह है कि आम जनता के लिये दीपावली के दीये किस तरह से मुश्किल बढ़ा सकते हैं। बुलेटिन की टीम ने ग्राउंड जीरो पर जो आंकड़े इकट्ठे किये, उन्होंने सभी को हैरान कर दिया है। आपको बता दें कि जब 2004 में एनडीए चुनाव हारी थी तो तेल की कीमतें लगभग ₹30 प्रति लीटर थी। उसके बाद जब 2014 में यूपीए चुनाव हारी थी, तो सरसों के तेल की कीमतें ₹52 प्रति लीटर हो गई थी। अब चल रहा है 2025 यानि 11 साल में सरसों के तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। आज की स्थिति हम देखें, तो तेल के रेट प्रति किलो 170 रुपये लीटर हैं। मतलब कि 11 साल में 118 रुपए सरसों के तेल में वृद्धि दर्ज की गई है।

फिलहाल लोकल मंडी की बात करें तो इस समय 3 कंपनियों के तेल की मांग बाजार में सबसे ज्यादा है। पहले नंबर पर है फॉर्च्यून तेलः इसे व्यापारी सबसे शुद्ध मानते हैं। इस तेल की कीमत 2600 रुपए प्रति 15 लीटर होती है। यानि कि अगर प्रति 15 लीटर की आत करें तो 170 रुपए प्रति लीटर इस समय रेट चल रहा है। दूसरे नंबर पर आता है धारा कंपनी का सरसों का तेल। जो कि इस समय अगर थोक के भाव पर नजर डालें, तो 2550 रुपए प्रति लीटर है। अगर आप 1 लीटर के हिसाब से देखें तो 165 रुपए इसकी वर्तमान में कीमत चल रही है। आपको बता दें कि यह सारे आंकड़े बुलेटिन की टीम ने तेल मंडी से इकडे किये हैं। इसके अतिरिक्त अगर बात करें उस तेल की, जिसकी मांग तीसरे नंबर पर धरातल पर ज्यादा है, वो है चौधरी। जिसकी कीमत 2500 रुपए प्रति 15 लीटर यानि 160 रुपए प्रति लीटर कीमत चल रही है।

ऐसे में आप यह समझिए कि कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है। पिछले 11 सालों के दौरान। अगर आप आंकड़ों के अनुसार समझे तो 2004 से 2014 तक कीमतों में जो उछाल आया है, वो मात्र 12 रुपए का गानि 2004 में कीमत थी 30 रुपए प्रति लीटर और 2014 में कीमत हो गई 52 रुपए प्रति लीटर और अब बात करें 2025 की यानि 11 साल होते-होते कीमत 170 रुपए हो गई है। यानि लगभग 118 रुपए का उछाल अब आप समझेंगे कि आखिर कैसे सरसों का तेल इस समय रसोईयों से दुर्लभपदार्थ होने की कगार पर पहुंच गया है। ऐसे में आप क्या समझते हैं कि यह कैसी जीडीपी है? जो हमारी विश्व में तीसरे नंबर पर पहुंच चुकी है।

अगर विशेषज्ञों की मानें तो सरसों के तेल की कीमतों में वृद्धि का कारण आपूर्ति में कमी, खराब मौसम से फसल उत्पादन पर असर, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खादा तेलों की कीमतों में उछाल, बढ़ती घरेलू मांग, और बिचौलियों की भूमिका जैसे कई कारक हैं। इसके अलावा, सीमा शुल्क में बदलाव और किसानों द्वारा सही दाम मिलने तक सरसों का स्टॉक करना भी कीमतों को प्रभावित करता है। बेमौसम बारिश, सूखा और अन्य मौसमी बदलाव सरसों की फसल के उत्पादन को प्रभावित करते हैं।

जिससे बाजार में आपूर्ति घट जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं। वैश्विक बाजार में तिलहन और खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी भी भारतीय बाजार को प्रभावित करती है। आपको बता दें कि कई बार व्यापारी कृत्रिम कमी पैदा करने के लिए सरसों का स्टॉक जमा कर लेते हैं, जिससे बाजार में कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं। केंद्र सरकार द्वारा पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे अन्य खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क बढ़ाने से भी खाद्य तेलों पर महंगाई बढ़ी है, जो सरसों तेल की कीमतों को भी प्रभावित करती है। किसान उचित कीमत मिलने का इंतजार करने के कारण अपनी फसल को बाजार में नहीं उतारते हैं, जिससे बाजार में उसकी कमी बनी रहती है। यह भी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का एक कारण है। अब देखना यह है कि यह सारी चीजें नियंत्रण में लाकर सरकार लोगों को राहत दे पाती है या फिर सरसों को तेल दोहरा शतक लगा देता है।

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