मुजफ्फरनगर, 07 सितंबर (बु.)। स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी के डायलॉग तो शायद आपको बखूबी याद होंगे, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे और बस हम देखते ही रहेंगे। भाजपाईयों को भी ये डायलॉग अब रास आ गए हैं, क्योंकि पिछले पन्द्रह वर्षों से इस शहर का बच्चा-बच्चा भाजपा शासन होने के नाते भाजपाईयों के ही डायलॉग चलता आ रहा है। इस शहर से अतिक्रमण भी हटेगा, सड़कें भी बनेंगी, अवैध ई-रिक्शाएं भी जल्द हटाई जाएंगी। ऐसे फिल्मी डायलॉग भाजपाईयों के साथ-साथ शासन के नुमाइंदों ने भी रट लिये हैं और भाजपाईयों की तर्ज पर ही वे दो दिन सड़कों पर उतरकर ऐसा दशर्शाते हैं कि मानों कल से ही आपका शहर सिंगापुर बना देंगे, मगर ये मुजफ्फरनगर को मुजफ्फरनगर ही रहने दें तो गनीमत है। शहर के प्रत्येक समाचार पत्र की कलम चलते-चलते थक गयी है, मगर इस शहर में तो किसी ने विकास का मुंह अभी तक नहीं देखा। 9 माह में पैदा होने वाली चीज 15 साल में पैदा नहीं हो सकी। ऐसा लगता है कि जैसे सत्ताधारी आम जनता को हंसी-ठिठौली करके बेवकूफ बनाने की कवायद में लगे हों। ऐसे में आज शहर में दस हजार से भी अधिक ठेले लगे दिखाई दे रहे हैं। नगर पालिका से बात की जाएगी तो वहां इनका रिकॉर्ड 2-4 हजार में ही मिल पाएगा, बाकी सब किसकी सह पर लग रहे हैं, इसका जवाब शायद पालिका के पास न हो।
शहर की एक सड़क नहीं कोई भी सड़क उठाकर देख लो, कौन सी दुकान के बाहर सब्जी, फल और तोलिये आदि कपड़े बेचने का ठेला नहीं लगा है, इस इतना देखकर बता दो, मगर सत्ता की कुर्सियों पर मदहोश नेताओं को इस बात से कोई लेना-देना है ही नहीं। बस चुनाव के समय पर फिर एक बार नए वादों के साथ सड़कों पर उतरकर एक बार फिर जनता को किस तरह से बेवकूफ बनाया जाये, यही फॉर्मूला इजाद किया जा रहा होगा।
अब देखना यह होगा कि इस शहर को संवारने के लिए 2027 में कौन नेता इस शहर की जिम्मेदारी लेगा, क्योंकि हर बार नेता यही कहकर सत्ता पर काबिज होते हैं कि इस बार हम शहर के लिए न जाने कौन सा काम ऐसा करेंगे जो शहर अलग ही चमकेगा। आज न चमकने वाला शहर न जाने कब चमकेगा। जब सत्ता की चकाचौंध का अंधेरा आंखों पर छा जाए तो वास्तव में अतिक्रमण की सफेद पट्टी ठेले वालों को कहां दिखाई देगी। वोट बंटोरने की लालसा में न किसी से कुछ कहना न सुनना जिस धींगामुश्ती पर शहर चलता है, चलता रहने दो।
शहर में यदि किसी भी सड़क पर चला जाए तो शायद ही शाम 6 बजे के बाद कोई ठेले वाला ऐसा मिले जो सफेद पट्टी के अंदर अपना सामान बेच रहा हो। सभी के सभी सफेद पट्टी के बाहर सड़क के बीचोबीच आ जाते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे इनके चाचा ने सड़क इनके नाम आवंटित कर दी हो और कुछ भी कहने पर छाती चौड़ी करते हुए कहने वाले पर ही रौब गालिब करने लगते हैं।
ऐसे में यह कहना कहीं गलत न होगा कि वोट की राजनीति के चक्कर में नेताओं ने तो अपनी आंख पर काली पट्टी बांध ही ली है, साथ ही साथ प्रशासनिक अधिकारियों को भी यही इशारे दे रखे हैं कि दो दिन करो अतिक्रमण हटाने का ढोंग, फिर चाहे उसके बाद 29 दिन चलने दो सबकुछ रोंग।


