आगरा, खबर आगरा से है जहाँ गुरुद्वारा माईथान में गुरु ग्रंथ साहिब के भारत के सबसे छोटे स्वरूप विराजमान है।इसके साथ ही इस गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब के चार और एतिहासिक स्वरूप भी हैं। बताया जाता है की यह स्वरूप- 112 साल पुराना और एक इंच का है। इस दुर्लभ स्वरूप की लंबाई एक इंच, चौड़ाई एक इंच और मोटाई पौन इंच है। इन्हें सोने की पालकी में विराजमान कराकर दर्शन कराए जाते हैं, अन्य दिनों में इन्हें चांदी की डिब्बी में विराजमान किया जाता है। इसे पढ़ने के लिए लैंस भी रखा गया है।इसमें 1430 अंग यानी पृष्ठ हैं। सात रत्नों की स्याही से लिखी है बाणी- 325 साल पुराने स्वरूप में 1546 अंग हैं। इस स्वरूप में सोने, नीलम, माणिक, पुखराज समेत सात रत्नों की स्याही से बाणी लिखी गई है।हर पन्ने पर माणिक की स्याही से बार्डर भी बना हुआ है। बताया जाता है की प्रथम विश्व युद्ध (वर्ष 1914) में सिख रेजीमेंट को अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ा। सिख अपने किसी मकसद के लिए गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष अरदास करके ही जाते हैं। इसलिए सिख रेजीमेंट के कुछ सेनापतियों के लिए जर्मन प्रेस से एक इंच के 13 गुरुग्रंथ साहिब तैयार कराए गए थे। तैयार कराने के बाद उसकी डमी तोड़ दी, जिससे कोई फिर न बना सके। पूर्व मुख्य ग्रंथी कश्मीर सिंह को सेना के एक परिवार ने करीब दो दशक पहले यह गुरुग्रंथ साहिब भेंट किए थे।



